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गीता प्रेस, गोरखपुर >> आशा की नयी किरणें

आशा की नयी किरणें

रामचरण महेन्द्र

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :214
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1019
आईएसबीएन :81-293-0208-x

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प्रस्तुत है आशा की नयी किरणें...

ईश्वरीय शक्तिकी जड़ आपके अंदर है


संसारमें हाथी, घोड़े, भैसे, बैल इत्यादि बड़े शक्तिशाली जीव है। इनकी शारीरिक शक्तिकी सहायतासे मनुष्य बड़े-बड़े लट्ठे एक स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जाता है, पेड़ गिराता है, खेत जोतता है, कुँओंमेंसे जल निकालता है और भारी-भरकम शिलाखण्डोंको ढोता है। घोड़े तीव्र गतिसे एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जाते हैं और मनुष्यकी आज्ञाओंका पालन करते है; परंतु स्वयं हाथी, घोड़े, बैल इत्यादिको यह ज्ञान नहीं है कि शक्ति उनके अंदर छिपी है। वे उनकी पीठपर बैठे या डंडेसे हाँकते हुए आदमीमें शक्ति समझते है और चार पसलीके आदमीको आत्मसमर्पण कर देते हैं। यदि उन्हें किसी प्रकार यह ज्ञान हो जाय कि आदमीमें उनकी अपेक्षा बहुत कम शक्ति है, तो वे क्षणभरमें उसे धराशायी कर सकते हैं। घोड़े, हाथी कभी उसके वाहन नहीं रह सकते। सम्भव है वे मानवको ही अपना वाहन बना लें, पर उन्हें अपने जीवनभर अपनी गुप्त शक्तियोंका ज्ञान नहीं होता और वे छोटेसे मनुष्यके गुलाम बने रहते हैं।

मानव-समाजमें भी उपर्युक्त नियम लागू होता है। हमें दो प्रकारके व्यक्ति मिलते हैं। एक तो वे हैं, जिन्हें अभीतक अपनी गुप्त शक्तियोंका ज्ञान नहीं हुआ है, अन्धकारमें पड़े परतन्त्रता और बेबसीका जीवन व्यतीत कर रहे हैं। दूसरे वे हैं, जिन्हें अपनी शक्तियोंका ज्ञान हो चुका है। अधिकाश व्यक्ति प्रथम वर्गके हैं जिन्हें शक्तिका ज्ञान नहीं है। ये व्यक्ति सदा किस्मतको कोसा करते हैं। कभी संसारकी प्रतिकूलताको दोष दिया करते हैं। उन्हें स्वयं अपने ऊपर विश्वास नहीं है, अतः वे अपना जीवन परवशता, मजबूरी और लाचारीमें काट रहे हैं।

विश्वास कीजिये आपमें अनन्त शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। ईश्वरने अपने पुत्र-मनुष्यको असीम शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, नैतिक, दैवी आत्मिक शक्तियोंसे परिपूर्ण कर पृथ्वीपर भेजा है। आपकी शक्तियाँ इन्द्रके वज्रोंसे अधिक शक्तिशालिनी हैं। आपका मस्तिष्क शक्तियोंका विशाल भण्डार है। आपके शरीरके अंग-अंगमें बल, स्फूर्ति और तेज भरा हुआ है। आपकी आत्मा अद्भुत दैवी सामर्थ्योंकी पुंज है। सूर्यके तेज तथा हृदयस्थ आत्मतेजमें कोई भेद नहीं है।

सच मानिये, आप ईश्वरके अंश हैं। ईश्वर सर्वोच्च शक्तियोंके केन्द्रबिन्दु हैं। वस्तुतः वे सभी शक्तियाँ बीजरूपसे आपमें विद्यमान हैं, जो ईश्वरमें हैं। ईश्वर सत्-चित्- आनन्दस्वरूप हैं। अभी आप अपने-आपको शरीर मानते है; पर वास्तवमें आप सत्-चित्-आनन्दस्वरूप आत्मा हैं। आप स्थूल नहीं, सूक्ष्म हैं। आप आत्मा हैं। आप अमर हैं। आप विश्वमें व्याप्त ईश्वरीय शक्ति हैं। आप दिव्य हैं। मनमें यह भाव मत लाइये कि 'मैं नीच हूँ। अशक्त हूँ। डरपोक अथवा कायर हूँ।' शक्तिकी जड़ आपके भीतर है। ईश्वरका राज्य आपके भीतर है। आप व्यर्थ ही ईश्वरीय शक्तियोंको दुर्बल मानवके बनाये मठ-आश्रमोंमें अथवा गिरजाघरोंमें ढूँढ़ते फिरते हैं। ईश्वरीय दिव्यतम शक्तिका आदिस्रोत तो स्वयं आपके अन्तरिक्षमें प्रवाहित हो रहा है। उसीको खोज निकालिये और दिव्य जीवन व्यतीत कीजिये।

कभी न कहिये कि आप अमुक कार्य करनेके योग्य नहीं हैं अथवा आपमें उसके लिये पर्याप्त बल या साधन नहीं हैं। आपमें सब प्रकारके उच्चतम सामर्थ्य भरे पड़े हैं। आप अपने निश्चय, बल, संकल्पकी दृढ़ता, अटूट परिश्रमसे जो चाहें कर सकते हैं, आपकी सदैव विजय होनी है। यदि अपने इष्ट मार्गपर लगे रहें तो आप परिस्थितियोंको अवश्य बदल सकेंगे। पराजयका विचार मनमें रखना एक खतरा है। इसे सदाके लिये निकाल देना चाहिये। जैसा विचार मनमें आयेगा, वैसा ही कार्य प्रकट होगा। जैसा बीज होगा, वैसा ही वृक्ष उत्पन्न होगा। अतः कमजोरी, निर्बलता, पराजय, हीनत्वके विचार रखना एक खतरा है। कभी भी वह कटु फल उत्पन्न कर सकता है; क्योंकि विचार तो एक सूक्ष्म सक्रिय तत्त्व है। विचारोंके परमाणु मनःप्रदेशमें बिखरकर उसे अपने अनुकूल बना लेते है। राग, द्वेष, घृणा, स्वार्थ और ईर्ष्याके विचारोंका दूषित वातावरण मनमें अशान्ति उत्पन्न करता और संतुलनको छिन्न-भिन्न कर देता है, नाना प्रकारके उद्वेग और उलझनें उत्पन्न कर देता है। अशान्ति, भय, घबराहट, चिड़चिड़ापन, अस्थिरता सब गलत प्रकारके विचारोंके दुष्परिणाम हैं।

अतः अपनी शक्तिके प्रति मनमें अविश्वासकी दीनहीन भावना मत आने दीजिये। अपने मानसिक वातावरणको भय, भ्रान्ति, शंका, संदेह और चिन्ताके मनोवेगोंसे मुक्त रखिये। ये निष्कृष्ट विचार मनुष्यकी शक्तिको पंगु करनेवाले हैं,

अन्तःकरणकी श्रद्धाकी दुर्बलताके सूचक हैं। अपने ऊपर विश्वास करना ऐसा मन्त्र है जिससे बल बढ़ता है।

जैसा हम देखते, सुनते या सोचते हैं, वैसा ही हमारे अन्तर्जगत्का निर्माण होता है। हम जो-जो वस्तुएँ बाह्य संसारमें देखते हैं, हमारी अभिरुचिके अनुसार उनका प्रभाव हमारे अन्तःकरणपर पड़ता है। प्रत्येक अच्छी मालूम होनेवाली प्रतिक्रियासे हमारे मनमें एक मानसिक मार्ग बनता है। क्रमशः वैसा ही चिन्तन, विचार या कार्य करनेसे यह मानसिक मार्ग दृढ़ बनता जाता है। अन्तमें एक विचार ही आदत बनकर मनुष्यको अपना दास बना लेता है।

जो व्यक्ति अपनी शक्तियोंके प्रति असीम विश्वास बनाये रखने और उन्हें निरन्तर बढ़ानेका अभ्यास करता है, वह उन्नतिके पथपर चलता है। दूसरोंकी और अपने चरित्रकी अच्छाइयोंपर ध्यान लगाइये। सर्वत्र अच्छाइयाँ शक्तियाँ दैवी गुण देखनेसे मनुष्य स्वयं शक्तियों और गुणोंका केन्द्र बन जाता है।

अच्छाई देखनेकी आदत एक प्रकारका पारस है। जिसके पास अच्छाई देखनेकी आदत है, वह उसीकी शक्तिसे दिव्य गुणोंकी वृद्धि करता है। उस केन्द्रसे ऐसा विद्युत्-प्रकाश प्रसारित होता है, जिससे सर्वत्र सत्यता और दिव्यताका प्रकाश होता है। जिस स्थानपर नैतिक माधुर्य एकीभूत हो जाता है, वहीं सच्चा आत्मिक सौन्दर्य विद्यमान है। अतः यह मानकर चलिये कि आप असीम शारीरिक मानसिक और आत्मिक शक्तियोंके मालिक हैं।

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    अनुक्रम

  1. अपने-आपको हीन समझना एक भयंकर भूल
  2. दुर्बलता एक पाप है
  3. आप और आपका संसार
  4. अपने वास्तविक स्वरूपको समझिये
  5. तुम अकेले हो, पर शक्तिहीन नहीं!
  6. कथनी और करनी?
  7. शक्तिका हास क्यों होता है?
  8. उन्नतिमें बाधक कौन?
  9. अभावोंकी अद्भुत प्रतिक्रिया
  10. इसका क्या कारण है?
  11. अभावोंको चुनौती दीजिये
  12. आपके अभाव और अधूरापन
  13. आपकी संचित शक्तियां
  14. शक्तियोंका दुरुपयोग मत कीजिये
  15. महानताके बीज
  16. पुरुषार्थ कीजिये !
  17. आलस्य न करना ही अमृत पद है
  18. विषम परिस्थितियोंमें भी आगे बढ़िये
  19. प्रतिकूलतासे घबराइये नहीं !
  20. दूसरों का सहारा एक मृगतृष्णा
  21. क्या आत्मबलकी वृद्धि सम्मव है?
  22. मनकी दुर्बलता-कारण और निवारण
  23. गुप्त शक्तियोंको विकसित करनेके साधन
  24. हमें क्या इष्ट है ?
  25. बुद्धिका यथार्थ स्वरूप
  26. चित्तकी शाखा-प्रशाखाएँ
  27. पतञ्जलिके अनुसार चित्तवृत्तियाँ
  28. स्वाध्यायमें सहायक हमारी ग्राहक-शक्ति
  29. आपकी अद्भुत स्मरणशक्ति
  30. लक्ष्मीजी आती हैं
  31. लक्ष्मीजी कहां रहती हैं
  32. इन्द्रकृतं श्रीमहालक्ष्मष्टकं स्तोत्रम्
  33. लक्ष्मीजी कहां नहीं रहतीं
  34. लक्ष्मी के दुरुपयोग में दोष
  35. समृद्धि के पथपर
  36. आर्थिक सफलता के मानसिक संकेत
  37. 'किंतु' और 'परंतु'
  38. हिचकिचाहट
  39. निर्णय-शक्तिकी वृद्धिके उपाय
  40. आपके वशकी बात
  41. जीवन-पराग
  42. मध्य मार्ग ही श्रेष्ठतम
  43. सौन्दर्यकी शक्ति प्राप्त करें
  44. जीवनमें सौन्दर्यको प्रविष्ट कीजिये
  45. सफाई, सुव्यवस्था और सौन्दर्य
  46. आत्मग्लानि और उसे दूर करनेके उपाय
  47. जीवनकी कला
  48. जीवनमें रस लें
  49. बन्धनोंसे मुक्त समझें
  50. आवश्यक-अनावश्यकका भेद करना सीखें
  51. समृद्धि अथवा निर्धनताका मूल केन्द्र-हमारी आदतें!
  52. स्वभाव कैसे बदले?
  53. शक्तियोंको खोलनेका मार्ग
  54. बहम, शंका, संदेह
  55. संशय करनेवालेको सुख प्राप्त नहीं हो सकता
  56. मानव-जीवन कर्मक्षेत्र ही है
  57. सक्रिय जीवन व्यतीत कीजिये
  58. अक्षय यौवनका आनन्द लीजिये
  59. चलते रहो !
  60. व्यस्त रहा कीजिये
  61. छोटी-छोटी बातोंके लिये चिन्तित न रहें
  62. कल्पित भय व्यर्थ हैं
  63. अनिवारणीयसे संतुष्ट रहनेका प्रयत्न कीजिये
  64. मानसिक संतुलन धारण कीजिये
  65. दुर्भावना तथा सद्धावना
  66. मानसिक द्वन्द्वोंसे मुक्त रहिये
  67. प्रतिस्पर्धाकी भावनासे हानि
  68. जीवन की भूलें
  69. अपने-आपका स्वामी बनकर रहिये !
  70. ईश्वरीय शक्तिकी जड़ आपके अंदर है
  71. शक्तियोंका निरन्तर उपयोग कीजिये
  72. ग्रहण-शक्ति बढ़ाते चलिये
  73. शक्ति, सामर्थ्य और सफलता
  74. अमूल्य वचन

विनामूल्य पूर्वावलोकन

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